1.1 Historical Perspectives of Disability: National and International and; modals of disability

विकलांगता का ऐतिहासिक दृष्टिकोण

मानव सभ्यता में विकलांगता हमेशा से रही है। लेकिन समाज ने इसे कैसे समझा और विकलांग लोगों से कैसा व्यवहार किया — ये समय, धर्म, संस्कृति और राजनीति के साथ बदलता रहा है।

A. अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण



✳️ प्राचीन काल

ग्रीस और रोम जैसे देशों में विकलांगों को कमज़ोर और समाज पर बोझ समझा जाता था। स्पार्टा जैसे समाज में विकलांग बच्चों को मार दिया जाता था या जंगल में छोड़ दिया जाता था। सोच ये थी कि जो कमजोर है, वो समाज में रहने लायक नहीं।

✳️ मध्यकाल (मेडिवल पीरियड)

ईसाई धर्म में विकलांगता को ईश्वर की सज़ा या पाप का फल माना गया। कुछ विकलांगों की सेवा की जाती थी, पर कईयों को डरावना, जादूगर, या भूत-प्रेत मानकर सताया गया।

✳️ 18वीं-19वीं सदी

विज्ञान का असर बढ़ा, पर विकलांगों को अस्पताल या पागलखानों में भेजा जाता था। इन्हें "ठीक" करने की कोशिश की जाती थी। समाज से अलग रखा जाता था।

✳️ 20वीं सदी की शुरुआत

युजीनिक्स मूवमेंट (Eugenics) शुरू हुआ — विकलांग लोगों को शादी से रोका गया, जबरन नसबंदी की गई। जर्मनी (नाज़ी शासन) में विकलांगों को मार भी दिया गया, क्योंकि उन्हें "बेकार" समझा गया।

✳️ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद

युद्ध में घायल सैनिकों को समाज ने सम्मान देना शुरू किया — इससे विकलांगता को लेकर सोच थोड़ी बदली। 1948 में संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार घोषणा पत्र (UN Declaration of Human Rights) आया।

✳️ आधुनिक दौर

1970s-1980s में अमेरिका और यूरोप में "Disability Rights Movement" चला — विकलांगों ने अपने अधिकारों की आवाज़ उठाई। ADA (1990) कानून बना जिसमें नौकरी, स्कूल, पब्लिक प्लेस में एसेसिबिलिटी को अधिकार माना गया। 2006 में बना UNCRPD (United Nations Convention on the Rights of Persons with Disabilities) — जो विकलांगों को बराबरी और सम्मान देने वाला ऐतिहासिक कदम था।

B. भारत का दृष्टिकोण

🕉️ प्राचीन भारत

विकलांगता को कर्मों का फल माना जाता था — "पिछले जन्म के पापों की सजा"। पर कई धार्मिक ग्रंथों जैसे मनुस्मृति, अर्थशास्त्र में विकलांगों के लिए सुरक्षा और सहायता का ज़िक्र भी है।

🕌 मध्यकाल

इस समय ज्यादा जानकारी नहीं मिलती, लेकिन विकलांग व्यक्ति ज़्यादातर निर्भर जीवन जीते थे। समाज में उनका कोई खास स्थान नहीं था।

👑 ब्रिटिश काल

ब्रिटिश सरकार ने विकलांगता को बीमारी माना और इन्हें अलग संस्थानों (Asylums) में रखा। स्कूल, नौकरी, और समाज में भागीदारी लगभग नहीं के बराबर थी।

स्वतंत्र भारत (1947 के बाद)

सरकार ने विकलांगों के लिए कल्याण योजनाएं शुरू कीं। 1995 में आया पहला बड़ा कानून: The Persons with Disabilities Act (1995) जिसमें शिक्षा, नौकरी, और सुविधाओं का अधिकार दिया गया। 2006 में बना National Policy for Persons with Disabilities और फिर सबसे बड़ा बदलाव: The Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 जिसमें विकलांगता की कैटेगरी 7 से बढ़ाकर 21 कर दी गई और अधिकार आधारित दृष्टिकोण अपनाया गया।

भाग 2: विकलांगता के मॉडल्स

अब बात करते हैं कि हम विकलांगता को समझते कैसे हैं — कौन-कौन से "मॉडल" हैं जो सोच को दर्शाते हैं।

1. मेडिकल मॉडल

"विकलांगता व्यक्ति में समस्या है, और उसे ठीक करना जरूरी है।" डॉक्टर, अस्पताल, इलाज पर ज़ोर। सोच: विकलांग इंसान को 'नॉर्मल' बनाना है। दिक्कत: इस मॉडल में समाज की ज़िम्मेदारी नहीं होती।

2. सोशल मॉडल

"समस्या व्यक्ति में नहीं, समाज में है — जो अवरोध (barriers) बनाता है।" अगर सीढ़ियाँ हैं और रैम्प नहीं, तो दोष व्यक्ति का नहीं, बिल्डिंग डिज़ाइन का है। यह मॉडल कहता है: "समाज को बदलो, ताकि सब शामिल हो सकें।"

3. चैरिटी मॉडल

"बेचारे विकलांग, उन्हें दया और मदद चाहिए।" सोच: विकलांग व्यक्ति पर दया करना चाहिए। दिक्कत: ये सोच उन्हें कमज़ोर और पराश्रित बनाती है, आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती है।

4. धार्मिक/कर्म सिद्धांत मॉडल

"विकलांगता पिछले जन्म के कर्मों का फल है।" यह मॉडल बहुत पुराना है। कुछ लोग इससे सेवा करते हैं, कुछ लोग छूआछूत जैसे व्यवहार करते हैं।

5. ह्यूमन राइट्स मॉडल

"हर इंसान को बराबरी, सम्मान और अधिकार मिलने चाहिए – चाहे वह कैसा भी हो।" UNCRPD इसी सोच पर आधारित है। शिक्षा, नौकरी, स्वास्थ्य, यातायात — सब कुछ विकलांगों के लिए भी हक है, सहायता नहीं।

6. बायो-साइको-सोशल मॉडल

"व्यक्ति के स्वास्थ्य, मनोस्थिति और समाज – तीनों का योगदान है विकलांगता को समझने में।" यह WHO का मॉडल है। संतुलित दृष्टिकोण है — ना सिर्फ डॉक्टर, ना सिर्फ समाज, दोनों को जिम्मेदार मानता है।

विकलांगता मॉडल्स की तुलना

मॉडल का नाम सोच क्या है? अच्छा क्या है? कमज़ोरी क्या है?
मेडिकल मॉडल विकलांगता = बीमारी इलाज पर फोकस समाज की भूमिका को नजरअंदाज़
सोशल मॉडल समाज ही अवरोध पैदा करता है समावेशिता को बढ़ावा हर बार शारीरिक पीड़ा नहीं समझता
चैरिटी मॉडल दया, मदद की ज़रूरत भावना अच्छी हो सकती है आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है
धार्मिक/कर्म मॉडल पाप-पुण्य का फल सेवा भावना भेदभाव का कारण बनता है
ह्यूमन राइट्स मॉडल बराबरी और हक कानूनी और नैतिक ताकत कार्यान्वयन मुश्किल हो सकता है
बायो-साइको-सोशल मॉडल शरीर, मन और समाज सभी कारक हैं संतुलित नजरिया लागू करना जटिल हो सकता है

निष्कर्ष: विकलांगता को समझने का तरीका समय के साथ विकसित हुआ है। आज हमें एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो व्यक्ति की चुनौतियों को समझे, साथ ही समाज की जिम्मेदारी को भी स्वीकार करे। विकलांगता कोई दया या चैरिटी का विषय नहीं, बल्कि मानवाधिकार और समावेशिता का मुद्दा है।

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